Thursday, March 22, 2018

अस्त ग्रहों का गहन अध्ययन

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अस्त ग्रहों का गहन अध्ययन
By Himanshu Shringaari



                                                                एक अच्छे ज्योतिषि के लिए किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली का अध्ययन करते समय 
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अस्त ग्रहों का गहन अध्ययन करना अति आवश्यक है। किसी भी कुंडली में पाये जाने वाले अस्त
 
ग्रहों का अपना एक विशेष महत्व होता है तथा इन्हें भली भांति समझ लेना एक अच्छे ज्योतिषि के लिए अति आवश्यक होता है। अस्त ग्रहों का अध्ययन किए बिना कुंडली धारक के
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विषय में की गईं कई भविष्यवाणियां गलत हो सकती हैं, इसलिए इनकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। आइए देखते हैं कि एक ग्रह को अस्त ग्रह कब कहा जाता है तथा अस्त होने से किसी ग्रह विशेष की कार्यप्रणाली में क्या अंतर आ जाता है।
आकाश मंडल में कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है तथा इस ग्रह को अस्त ग्रह का नाम दिया जाता है। प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता डिग्रियों में मापी जाती है तथा इस मापदंड के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दूरी के अंदर आने पर अस्त हो जाता है :
चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
बुध सूर्य के दोनों ओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते।
                                किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने की स्थिति में उसके बल में कमी आ जाती है तथा वह किसी कुंडली में सुचारू रुप से कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाता। किसी भी अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के लिए उस ग्रह का किसी कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली विशेष में बल तथा अस्त ग्रह की सूर्य से दूरी देखना आवश्यक होता है। तत्पश्चात ही उस ग्रह की कार्य क्षमता के बारे में सही जानकारी प्राप्त हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में  चन्द्रमा सूर्य से 11 डिग्री दूर होने पर भी अस्त कहलाएंगे तथा 1 डिग्री दूर होने पर भी अस्त ही कहलाएंगे, किन्तु पहली स्थिति में कुंडली में चन्द्रमा का बल दूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के पास आ जाता है, उतना ही उसका बल क्षीण होता जाता है। इसलिए अस्त ग्रहों का अध्ययन बहुत ध्यानपूर्वक करना चाहिए जिससे कि उनके किसी कुंडली विशेष में सही बल का पता चल सके।
                               अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से चलने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है। यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह  अस्त होने के साथ साथ स्वभाव से शुभ फलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे आसान तथा प्रभावशाली उपाय है, कुंडली धारक को उस ग्रह विशेष का रत्न धारण करवा देना। रत्न का वज़न अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के बाद ही तय किया जाना चाहिए। इस प्रकार उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है जिससे वह अपना कार्य सुचारू रूप से करने में सक्षम हो जाता है। 
                               किन्तु यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को उसके रत्न के द्वारा अतिरिक्त बल नही दिया जाता क्योंकि किसी ग्रह के अशुभ होने की स्थिति में उसके रत्न का प्रयोग सर्वथा वर्जित है, भले ही वह ग्रह कितना भी बलहीन हो। ऐसी स्थिति में किसी भी अस्त ग्रह को बल देने का सबसे बढ़िया तथा प्रभावशाली उपाय उस ग्रह का मंत्र होता है। ऐसी स्थिति में उस ग्रह के मंत्र का निरंतर जाप करने से या उस ग्रह के मंत्र से पूजा करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता ही है, साथ ही साथ उसका स्वभाव भी अशुभ से शुभ की ओर बदलना शुरू हो जाता है। मेरे विचार से किसी कुंडली में किसी अस्त तथा अशुभ फलदायी ग्रह के लिए सर्वप्रथम उसके बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र के 125,000 मंत्रों के जाप से पूजा करवानी चाहिए तथा उसके पश्चात नियमित रूप से उसी मंत्र का जाप करना चाहिए जिसके जाप के द्वारा ग्रह की पूजा करवायी गई थी। 
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Astrologer Ashutosh 
+918866020025
ashutosh2362@gmail.com

Saturday, November 18, 2017

बच्चों के विकास के लिए 5 टिप्स

Today's Blog - हमारे BLOG-ARTICLES में अधिकतर ज्ञानवर्धक जानकारिया दी जाती है, तथा आलेख जहां से भी लिए जाते है, उन स्थानों व लेखकों का नाम-आदि भी दिया जाता है. क्योकि इस के द्वारा हम अपने पाठकों के लाभार्थ ही आलेख POST करते है. यदि किसी भी लेखक या संस्था को कोई शिकायत हो तो कृपया हमे बता दे हम POST हटा लेंगे.

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सद्‌गुरु बच्चों की परवरिश के पांच गुर बता रहे हैं जो बच्चों के पालन-पोषण में माता-पिता के बहुत काम आ सकते हैं। चाहे आप मां हों, पिता हों या आप माता-पिता बनने वाले हों, ये परामर्श आपके बहुत काम आ सकते हैं।
माता-पिता बनना एक विचित्र अनुभव है। आप कुछ ऐसा करने की कोशिश करते हैं जो आज तक कोई नहीं जान पाया कि उसे अच्छी तरह कैसे किया जाए। चाहे आपके बारह बच्चे हों, तब भी आप सीख ही रहे होते हैं। हो सकता है कि आपने ग्यारह बच्चे अच्छी तरह पाले हों, मगर बारहवें में आपको परेशानी हो सकती है।

1. सही माहौल बनाएं

जरूरी माहौल तैयार करना बच्चों के पालन-पोषण में एक बड़ी भूमिका निभाता है। आपको सही तरह का माहौल तैयार करना चाहिए, जहां खुशी, प्यार, परवाह और अनुशासन की एक भावना आपके अंदर भी और आपके घर में भी हो। आप अपने बच्चे के लिए सिर्फ इतना कर सकते हैं कि उसे प्यार और सहारा दे सकते हैं। उसके लिए ऐसा प्यार भरा माहौल बनाएं जहां बुद्धि का विकास कुदरती तौर पर हो। एक बच्चा जीवन को बुनियादी रूप में देखता है। इसलिए आप उसके साथ बैठकर जीवन को बिल्कुल नयेपन के साथ देखें, जिस तरह वह देखता है।
बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि जैसे ही बच्चा पैदा होता है, शिक्षक बनने का समय शुरू हो जाता है। जब एक बच्चा आपके घर में आता है, तो यह शिक्षक बनने का नहीं, सीखने का समय होता है।
जरूरी नहीं है कि आपका बच्चा जीवन में वही करे, जो आपने किया। आपके बच्चे को कुछ ऐसा करना चाहिए, जिसके बारे में सोचने की भी आपकी हिम्मत नहीं हुई। तभी यह दुनिया आगे बढ़ेगी और उपयोगी चीज़ें घटित होंगी।
मानव जाति की एक बुनियादी जिम्मेदारी है, कि वे ऐसा माहौल बनाए जिससे इंसानों की अगली पीढ़ी आपसे और हमसे कम से कम एक कदम आगे हो। यह बहुत ही अहम है कि अगली पीढ़ी थोड़ी और खुशी से, कम डर, कम पक्षपात, कम उलझन, कम नफरत और कम कष्ट के साथ जीवन जिए। हमें इसी लक्ष्य को लेकर चलना चाहिए। अगली पीढ़ी के लिए आपका योगदान यह होना चाहिए कि आप इस दुनिया में कोई बिगड़ैल बच्चा न छोड़ कर जाएं, आप एक ऐसा इंसान छोड़ कर जाएं जो आपसे कम से कम थोड़ा बेहतर हो।

2. अपने बच्चे की जरूरतों को जानें

कुछ माता-पिता अपने बच्चों को खूब मजबूत बनाने की इच्छा या चाह के चलते उन्हें बहुत ज्यादा कष्ट में डाल देते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे वह बनें जो वे खुद नहीं बन पाए। अपने बच्चों के जरिये अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने की कोशिश में कुछ माता-पिता अपने बच्चों के प्रति बहुत सख्त हो जाते हैं। दूसरे माता-पिता मानते हैं कि वे अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और अपने बच्चों को इतना सिर चढ़ा लेते हैं कि उन्हें इस दुनिया में लाचार और बेकार बना देते हैं।
एक योगी थे जो कश्मीरी शैव नामक एक खास परंपरा से ताल्लुक रखते थे। यह योग के सात प्रकारों में से एक है। यह योग का बहुत शक्तिशाली तरीका है मगर यह मुख्य रूप से कश्मीर इलाके में सीमित है, इसलिए इसे यह नाम मिला। एक दिन, इस योगी ने एक ककून देखा जिसमें थोड़ी सी दरार थी और उसके अंदर मौजूद तितली बाहर आने के लिए छटपटा रही थी। ककून का खोल बहुत सख्त था। आम तौर पर तितली ककून से बाहर आने के लिए लगातार लगभग अड़तालीस घंटे संघर्ष करती है। अगर वह बाहर नहीं आ पाती, तो मर जाती है। योगी ने यह देखा और करुणावश उन्होंने अपने नाखून से ककून को खोल दिया ताकि तितली आजाद हो सके। मगर जब वह बाहर आई, तो उड़ नहीं पाई। ककून को तोड़कर बाहर आने का संघर्ष ही तितली को इतना मजबूत बनाता है कि वह अपने पंखों का इस्तेमाल करके उड़ सके। उस तितली का क्या काम जो उड़ ही न सके? बहुत से लोग अपने बच्चों को लाड़-प्यार में ऐसा ही बना देते हैं। ऐसे बच्चे अपने जीवन में ऊँचाइयों को नहीं छू पाते।
सभी बच्चों पर एक ही नियम लागू नहीं होता। हर बच्चा अलग होता है। यह एक खास विवेक है। इस बारे में कोई सटीक रेखा नहीं खींची जा सकती कि कितना करना है और कितना नहीं करना है। अलग-अलग बच्चों को ध्यान, प्यार और सख्ती के अलग-अलग पैमानों की जरूरत पड़ सकती है। अगर मैं नारियल के बाग में खड़ा हूं और आप आकर मुझसे पूछें कि ‘हर पौधे में कितना पानी देना है,’ तो मैं कहूंगा, ‘कम से कम पचास लीटर।’ लेकिन अगर आप घर जाकर अपने गुलाब के पौधे में 50 लीटर पानी डाल दें, तो वह मर जाएगा। इसलिए आपको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आपके घर में किस तरह का पौधा है।

3. बच्चे से सीखें

बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि जैसे ही बच्चा पैदा होता है, शिक्षक बनने का समय शुरू हो जाता है। जब एक बच्चा आपके घर में आता है, तो यह शिक्षक बनने का नहीं, सीखने का समय होता है क्योंकि अगर आप अपनी और अपने बच्चे की ओर देखें, तो आपका बच्चा ज्यादा खुश होता है, है न? इसलिए यह उनसे जीवन के बारे में सीखने का समय है, सिखाने का नहीं। आप बच्चे को बस एक चीज सिखा सकते हैं – जो आपको कुछ हद तक सिखाना पड़ता है – कि दुनिया में किस तरह जीवन यापन से जुड़े काम करें। मगर जब खुद जीवन की बात आती है, तो एक बच्चा अपने अनुभवों से जीवन के बारे में ज्यादा जानता है। वह जीवन है, वह जीवन को जानता है। आपके साथ भी ऐसा होता है, कि अगर आप अपने मन पर थोपे गए प्रभावों को दूर कर दें, तो आपकी जीवन ऊर्जा जानती है कि कैसे रहना है। यह आपका मन है जो नहीं जानता कि कैसे रहना है। एक वयस्क हर तरह का कष्ट खुद पर ओढ़ने में माहिर होता है, ये सब कष्ट उसके मन में होते हैं। बच्चा अब तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा है। इसलिए यह सीखने का समय है, सिखाने का नहीं।

4. उसे अपने तरीके से रहने दें

अगर माता-पिता अपने बच्चों की वाकई परवाह करते हैं, तो उन्हें अपने बच्चों को इस तरह पालना चाहिए कि बच्चे को माता-पिता की कभी जरूरत न हो। प्यार की प्रक्रिया हमेशा आजाद करने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए, उलझाने वाली नहीं। इसलिए जब बच्चा पैदा होता है, तो बच्चे को चारों ओर देखने-परखने, प्रकृति के साथ और खुद अपने साथ समय बिताने दें। प्यार और सहयोग का माहौल बनाएं।
अगर आप अपने बच्चे का पालन-पोषण अच्छी तरह करना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको खुद खुश रहना चाहिए। अगर आपके बच्चे को घर में रोजाना तनाव, गुस्सा, डर, चिंता और ईर्ष्या देखने को मिलते हैं, तो उसका क्या होगा? पक्के तौर पर वह केवल इन्हीं से सीखेगा, है न?
उस पर अपने नैतिक मूल्य, विचार, धर्म या और कुछ थोपने की कोशिश न करें। बस उसे विकसित होने दें, उसकी बुद्धि को विकसित होने दें। सिर्फ एक इंसान के रूप में उसकी अपनी शर्तों पर जीवन की ओर देखने में उसकी मदद करें, परिवार या आपकी धन-दौलत या किसी और चीज से उसकी पहचान न बनने दें। एक इंसान के रूप में जीवन की ओर देखने में उसकी मदद करना उसकी खुशहाली और दुनिया की खुशहाली के लिए बहुत जरूरी है। यह आपके बच्चे के लिए सबसे अच्छा निवेश होगा अगर आप अपने बच्चे को प्रोत्साहित करें कि वह अपने बारे में सोचना सीखे, उसके लिए क्या बेहतर है यह जानने के लिए अपनी बुद्धि और समझ का इस्तेमाल करना सीखे। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप निश्चिंत रह सकते हैं कि आपका बच्चा सही तरीके से विकसित होगा।

5. आनंदित और शांत रहें

अगर आप अपने बच्चे का पालन-पोषण अच्छी तरह करना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको खुद खुश रहना चाहिए। अगर आपके बच्चे को घर में रोजाना तनाव, गुस्सा, डर, चिंता और ईर्ष्या देखने को मिलते हैं, तो उसका क्या होगा? पक्के तौर पर वह केवल इन्हीं से सीखेगा, है न? अगर आप वाकई अपने बच्चे का अच्छी तरह पालन-पोषण करने का इरादा रखते हैं, तो आपको खुद को एक प्यार करने वाले, आनंदित और शांत इंसान में बदलना होगा। अगर आप खुद को बदलने के काबिल नहीं हैं, तो अपने बच्चे को अच्छे से पालने का सवाल कहां उठता है?
अगर हम वाकई अपने बच्चे को अच्छी तरह पालना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि क्या हम खुद को रूपांतरित कर सकते हैं। जो भी माता-पिता बनना चाहते हैं, उन्हें एक साधारण सा प्रयोग करना चाहिए। उन्हें बैठकर देखना चाहिए कि उनके जीवन में क्या ठीक नहीं है और उनकी जिंदगी के लिए क्या अच्छा होगा। बाहरी दुनिया के लिए नहीं, बल्कि खुद उनके लिए। अगर आप अपने बारे में – अपना व्यवहार, बातचीत, रवैया और आदतें – तीन महीने में बदल सकते हैं, तो आप अपने बच्चे को भी समझदारी से संभाल सकते हैं।

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